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jindagi yahan bhi
जिन्दगी यहाँ भी कुछ अजीब सी है जैसे सपनो मे हुआ करती है हसीन सपनो की तरह ये भी कई खेल खिलाती है दुख मे भी सुखो के पल दिखाती है मगर फीर इन हसीन सपनो की तरह ये भी ओझल हो जाती है जिन्दगी यहाँ भी कुछ अजीब सी है कौन दोस्त है कौन है दुश्मन ये गजब मेल करवाती है गैर को ही दोस्त गैर से ही दुश्मनी करवाती है गैर दोस्त तो अपना बन जाता है जीस से होता है खून का रिश्ता वो जाने कब दुश्मन बन जाता है जिन्दगी यहाँ भी कुछ अजीब सी है अजब फनकार है यहाँ पर ओर चारो ओर सन्नाटा है धू धू कर जल रहा है म्नुष्या फीर भी चल रहा तमाशा है कौन है अपना कौन है पराया इसका हिसाब कौन करे जिन्दगी यहाँ भी कुछ अजीब सी है इसकी फरियाद कौन करे???????
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